ख़ुशी ही ख़ुशी बेसबब देखती हूँ तुझे मुस्कराते मैं जब देखती हूँ तुझे ही तुझे बस, मुझे देखने की बढ़ेगी कहाँ तक तलब! देखती हूँ यहाँ कौन कैसा है मुझको पता है मुझे सब ख़बर है मैं सब देखती हूँ ग़मों को ख़ुशी में बदलना है मझको मिलें तो ज़रा मुझको अब, देखती हूँ कभी तो रहम मुझपे आएगा उसको कहाँ तक सताएगा रब ! देखती हूँ

कभी तो बात मेरी मान जाया कर न मेरी चाहतों को आजमाया कर मोहब्बत करनी है तो कर सलीके से मोहब्बत का तमाशा मत बनाया कर नज़र तुझको न लग जाए ज़माने की ज़माने से ज़रा ख़ुद को बचाया कर मेरी आँखें अगर हैं झील के जैसी कहीं मत जा इन्हीं में डूब जाया कर "खनक" ये ज़िंदगानी है बहुत छोटी हँसा कर और खुल कर मुस्कुराया कर कवयित्री-स्नेहा त्रिपाठी 'खनक '

प्रार्थना है यही लौट आओ प्रिये, तुम न होगे तो मै भी किधर जाऊँगी l टूट कर मैं बिखरी सी गई हूँ बहुत , प्रेम पा कर तुम्हारा सँवर जाऊँगी l मन सुकोमल बड़ा है दुखाओ न तुम l रूठ कर इस तरह दूर जाओ न तुम l पीर मेरी अगर हो सके बाँट लो , तोड़ कर ये हृदय मुस्कुराओ न तुम l बस तुम्हारा मुझे आसरा है प्रिये तुम अगर चाह लो मैं निखर जाऊँगी l प्रेम पा कर तुम्हारा ....... प्राण प्रिय हो तुम्हीं प्राण धन हो तुम्हीं देह हूँ मात्र मैं मेरा मन हो तुम्हीं l भाग्य में साथ मेरा तुम्हारा न हो , कल्पनाओं में सातों जनम हो तुम्हीं l देह अवसान की ओर अब जा रही इक छुअन से तुम्हरी मैं तर जाऊँगी l प्रेम पा कर तुम्हारा ....... प्रेम ही मेरे जीवन का आधार है l और सब कुछ बिना प्रेम बेकार है l साथ तुम दो मेरा तो मैं जग जीत लूँ, तुम न होगे तो जीवन को धिक्कार है l जल रही हूँ विरह अग्नि में इस तरह लग रहा मृत्यु से पूर्व मर जाऊँगी l प्रेम पा कर तुम्हारा ....... कवयित्री-स्नेहा त्रिपाठी 'खनक '

जीवन के इस अंकगणित का कोई समीकरण है। रूप देवता का जैसे स्थाई ध्रुवीकरण है। ओ दुनिया की सबसे सम्मोहक जादूगरनी सुन। तेरी आँखें इंद्रजाल तू पूरा वशीकरण है। दुनिया का सौन्दर्य तुम्हारे बल पर तैर रहा हो। राम सेतु ज्यों अतल सिंधु के तल पर तैर रहा हो। काली आंखों पर दो पुतली ऐसे तैर रही हैं। जैसे कोई कमल झील के जल पर तैर रहा हो। जितनी सारी आंखें उतनी सारी दुनिया दिखती है। देख सको तो देखो कितनी प्यारी दुनिया दिखती है। देखने वाले चांद सितारे जाने क्या - क्या देखें। मुझको तो एक लड़की में ही सारी दुनिया दिखती है।। - - - - - - - - - - - - - - -। मन को मन के मनके पर विश्वाश करा रक्खा था। अपनी हर एक धड़कन को एहसास करा रक्खा था। मुझको मालूम था तुम एक दिन जीवन में आओगी। इसीलिए इन आंखों को उपवास करा रक्खा था। धरती और गगन दोनों एक साथ सदय हो जाएं। जैसे कोई दुर्जय गढ़ एक पल में जय हो जाए। इतना सहज नहीं है मेरा प्यार भरा आलिंगन। मैं जिसको मिल जाऊं उसका भाग्य उदय हो जाए। अंग अंग दूध से नहाया हुआ लगता है, रूप जैसे चंदन अबीर जैसी लड़की। तन मन दोनों हों पवित्र जिसे देखने से, गंगा जी के निर्मल नीर जैसी लड़की। शब्द शब्द शहद लगाया हुआ पढ़ने में सूर मीरा तुलसी कबीर जैसी लड़की। दिल से बिहार जैसी खूंखार है परंतु देखने में जम्मू कश्मीर जैसी लड़की। - Atul upadhyay

तुम्हें निहारते हुए मैं ये जीवन बिताना चाहता हूं तुम दूर होकर भी बड़ी करीब हो मेरे मैं ये तुम्हें बताना चाहता हूं लोग चाहे कुछ भी समझे पर तुम एकतरफा मित्र हो मेरी मैं इस बात पे इतराना चाहता हूं तुम्हारी आंखें चांद से ज्यादा चमकती हैं मैं तुम्हारी आंखों में डूबकर खो जाना चाहता हूं बेशक तुम्हारा हाथ पकड़ के चलने को सारा शहर बेताब बैठा हैं मैं फिर भी तुम्हारी दोस्ती पाना चाहता हूं तुम नारी के रूप में सादगी की मूरत हो , मैं तुम्हें पलकों पे बिठाकर अपना शीश झुकाना चाहता हूं तुम्हारे रोज बदलते स्वभाव को देखकर भी मैं अपनी निगाहें तुम पे टिकाना चाहता हूं सच कहूं तो तुम वो लड़की हो रिचा जिसको सफ़ल होता देख मैं भी जश्न मनाना चाहता हूं तुम्हारा ख्याल आते ही आज भी मुस्कुरा देता हूं मै भी तुम्हारे दोस्ती की लिस्ट में आना चाहता हूं मैं हैरान हूं तुम्हें तकलीफें लिए मुस्कुराता देखकर मैं भी तुम जैसा खुद को बनाना चाहता हूं अब बस बहुत हुआ , दुनिया की बातों को सोचना बंद करो तुम हर तरह से श्रेष्ठ हो इस बात का यकीं तुम्हें दिलाना चाहता हूं मुझे स्वार्थ भरी दोस्ती नहीं चाहिए मैं सच्चा दोस्त बनकर तुम्हारा सारे रिश्तों को तुमसे निभाना चाहता हूं - Swaraj dhar Dwivedi

मेरी चाहत को हर किसी ने दबाया बहुत हैं मैं टूट चुका हूं अंदर से ज़माने ने मुझे सताया बहुत हैं मैं लड़का होकर भी बेहद उदास रहता हूं दुनिया ने मुझे तड़पाया बहुत हैं मेरी हर गलती को लोग गुनाह कहते हैं बड़ा होकर मैने खुद नजरों में खुद को गिराया बहुत हैं मैं कैसे खरीद सकता हूं इस शहर में मकान यहां तो चार दीवारी का किराया बहुत हैं मैं अक्सर उन्हीं लोगों के साथ रहता हूं जिन्होंने अक्सर ही मुझसे हाथ छुड़ाया बहुत हैं घर की जिम्मेदारी में उलझा हुआ हूं मेरी जिंदगी ने मुझे डराया बहुत हैं भविष्य की सोच , आज की चिंता और खुद की हालत देख बिलख रहा हूं मैं सच कहूं तो घर में रहकर मैने अपना वक्त बिताया बहुत हैं मेरे करीब आकर देखों मेरे चेहरे की शिकन मुस्कुराने की कोशिश में मैने भी आंसू बहाया बहुत हैं अब ये छुट्टियों का दौर मुझे और भी ज्यादा तन्हाई देता है मैने बंद कमरे में खुद को छुपाया बहुत हैं अब की बात अब तुम्हें कैसे बताऊं जिंदगी की उलझन में फंसाकर खुद को मैंने खुद को समझाया बहुत हैं - Swaraj dhar Dwivedi
